रामचरितमानस के मंत्र

गोस्वामी तुलसीदासजी के द्वारा प्रकट किये गये रामचरितमानस के मन्त्र

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रामचरित मानस की रचना संसार हित के लिये की गयी थी,चार्वाक-मत तो हर जगह उपस्थित रहे है,लेकिन जो ग्रंथ सभी तरह की नुक्ताचीनी से दूषित नही हुआ,और अपनी आस्था का तार लेकर हर प्रकार के धार्मिक और श्रद्धा को मानने वाले लोगों के अन्दर आज तक जमा हुआ है,उसका एक ही कारण है,कि सत्य तो सत्य ही होता है,असत्य को जमा नही किया जा सकता है,लेकिन सत्य का इतिहास बन जाता है,रामायण के मन्त्रों का विस्तार केवल उन अन्जान लोगों के लिये है जो पूजा पाठ और धार्मिक कृत्यों को अधिक नही जानते है,केवल उनके अन्दर नाम को समझने की महिमा होती है,और जिसने नाम को जान लिया मैं मानता हूँ कि उसने सबकुछ आसानी से समझ लिया है,नाम को पुकारने के कई प्रकार होते है,किसी का नाम पुकारते वक्त आदरणीय नाम लिया जाता है,और किसी के नाम के आगे अनादर का भाव प्रकट किया जाता है,लेकिन रामायण में जो कहा गया है,वह सौ प्रतिशत सत्य है,इसका मैं अकेला गवाह नही हूँ,जो भी ज्ञानी ध्यानी है,और ज्ञान की परिभाषा को जानता है,वह समझता है.रामकथा के अन्दर किसी भी शक या शंका का निवारण किया गया है,कहा भी है,"रामकथा सुन्दर कर तारी,संसय विहग उडावन हारी",जिस प्रकार से खेत के अन्दर छिपे पंक्षियों को जो दिखाई नही देते है,को समझने के लिये एक ताली को पीट कर पता किया जाता है,जैसे दोनो हाथों की हथेली को आपस में पीट कर "पट" की आवाज की जाती है,और खेत के अन्दर जो पक्षी छिपे बैठे होते है,वे ताली की पट की आवाज सुनकर उड जाते है उसी प्रकार से रामकथा के अन्दर जीवन के किसी भी शक या शंका का समाधान मिल जाता है.मैने ज्योतिष का अधिक से अधिक ज्ञान रामचरित मानस के द्वारा प्राप्त किया है,हमारे भदावर क्षेत्र में जब भी कोई मान्यता मानी जाती है,और उस मान्यता को पूरा करने के लिये रामचरित मानस का अखंड या मासिक या साप्ताहिक पाठ बोला जाता है,जैसे ही काम हो जाता है,और मान्यता को पूरा करने के लिये तुरत रामचरितमानस का पाठ चालू किया जाता है.

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केवल दो ही चौपाइयों का सम्पुट अधिक मिलता है,एक तो "मंगल भुवन अमंगल हारी,द्रवउ से दसरथ अजिर बिहारी",और दूसरी "दीन दयाल बिरदु सम्भारी,हरहु नाथ मम संकट भारी",इसके बाद जो अधिक जानते है,वे अधिक और चौपाइयों का बखान करते है.पहली चौपाई का भाव केवल एक मनुष्य या परिवार के लिये नही है,इस चौपाई का भाव अगर समझा जावे तो बहुत बडा मिलता है,मंगल का अर्थ अगर ज्योतिष से लिया जावे तो भाई से मिलता है,शरीर में खून से मिलता है,संसार में धर्म से मिलता है,और हिम्मत और साहस से मिलता है,संसार में चलने वाले धर्म के अन्दर अधर्म को चलने से रोकने के लिये प्रार्थना का रूप यह चौपाई है,और प्रभु राम से प्रार्थना की गयी है,कि धर्म के प्रति अब तो इस अधर्मी संसार के मन में द्रवता का भाव भरो,द्रवता का अर्थ दायलुता से है,जो लोग एक दूसरे को मारे डाल रहे है,शराब मांस का भक्षण करने के बाद उनको पता नही होता कि वे क्या करने जा रहे है,जिस जर जोरू जमीन के लिये वे लडे जा रहे है,वह कल भी उनकी नही थी,आज कुछ समय के लिये वे मान सकते है,कि उनकी है,लेकिन कल और किसी की होगी,करोडों वर्षों से यह कहानी चली आ रही है,राजाओं ने फ़ौजें कटवादीं,लाखों लोग इन तीन के लिये मरे और मारे गये है,लेकिन समझ आज भी किसी को नही आ रही है.रामायण की चौपाइयों का अर्थ और उनका महत्व हम आगे कभी समझायेंगे,लेकिन जिन चौपाइयों को केवल स्मरण करने से बाधा दूर होती है,और प्रधानत: शांति का भान होता है,उन चौपाइयों का अर्थ और स्मरण का तरीका हम आपके समक्ष प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहे है,किसी प्रकार की भाषाई त्रुटि अगर हो जाती है,तो सज्जन क्षमा भी करेंगे,ऐसा मेरा विश्वास है.

रामायण का सबसे बडा मंत्र

रामायण का सबसे बडा मंत्र मिल जाये तो संसार की कोई भी निधि उसके सामने मायना नही रखती है,निधि को तो चोर ले जायेंगे,लुटेरे लूट लेंगे,लेकिन अगर यह निधि अगर ह्रदय में निवास करते है,तो फ़िर से वापस सभी निधियां आ जायेंगी.रामायण के सबसे बडे मंत्र का बखान श्री गोस्वामी तुलसीदास जी ने कितनी खूबशूरती से किया है:-

"राम रमेति रमेति रमो,रामेति मनोरमे,सहस्त्र नाम तातुल्यम राम नाम वरानने"

इस मंत्र को ह्रदय में रखने के बाद संसार की सभी अमूल्य निधियां मनुष्य की दासी बन जायेंगी,और उसे किसी प्रकार का डर,भय,गरीबी,अपमान,आदि किसी भी बात को सहन नही करना पडेगा.इस मंत्र को मैने अपनाया है,और आज भी मेरे ह्रदय में निवास करता है,इस मंत्र को मैने साक्षात प्रभावी माना है,इसका एक प्रमाण आपके सामने प्रस्तुत करता हूँ.

मै चौथी कक्षा का विद्यार्थी था,मेरी माताजी मिट्टी के तेल की ढिबरी की रोशनी में मेरे से रामायण का पाठ रात को करवाया करतीं थी,गर्मी के दिनों में कच्चे घर के आंगन में पाठ चला करता था,और सर्दी में कच्चे कमरे के अन्दर पाठ किया जाता था,मेरे पडौस के लोग भी रामायण का पाठ सुनने और पढने के लिये आ जाया करते थे,रामायण को पढने के पहले और अन्त में उपरोक्त मंत्र को ग्यारह बार बोलना जरूरी माना जाता था,उस ग्यारह बार बोलने के कारण रामायण का यह महामंत्र ह्रदय के अन्दर निवास कर गया था,बालकपन की किसी भी समस्या के आते ही इस मंत्र का मानसिक जाप चालू हो जाता था,और समस्या के समाप्त होते ही इस मंत्र के प्रति श्रद्धा अपने आप बलवती होती जाती थी.मेरा घर गांव से बाहर था,और पुराना गांव ठेठ चम्बल नदी के किनारे बसा था,पुराने गांव तक जाने के लिये जंगल का रास्ता ही हुआ करता था,मेरी माताजी ने एक घरेलू काम के लिये पुराने गांव भेजा था,लौटने में रात हो गयी,जंगल का रास्ता और जंगली जानवरों की आवाजें किसी भी लकडी या पत्ते की खडखडाहट आसानी से भय पैदा करने के लिये काफ़ी थी,मेरे ह्रदय में अचानक मंत्र का उदगार चालू हो गया,जंगल के बीच में पहुंचते ही अचानक दस बारह भेडियों ने आकर मुझे घेर लिया,और मुझ पर हमला करने के लिये मेरे चारों तरफ़ से कोशिश करने लगे,रास्ते में पडे कंकडों के अलावा मेरे पास कोई और हथियार भी नही था,दस बारह कंकड उठाकर उनको मारने के लिये प्रयास करने लगा,एक को मारता तो दूसरा दूसरी तरफ़ से हमला करने की कोशिश करने लगता,पास आने से रोकने के लिये मैने आसपास के कंकडों को मारना ही बेहतर समझा,थकान भी काफ़ी हो गयी थी,एक बार तो समझ लिया था,अब तो यह दस बारह भेडिये खा ही जायेंगे,पस्त होते ही मेरे मन में यह मंत्र चालू हो गया था,माताजी ने बताया था कि किसी भी बडी से बडी आफ़त में यह काम आयेगा,लेकिन भेडियों के चक्कर में यह मंत्र न जाने कहां चला गया था,जैसे ही यह मंत्र मेरे मन में आया,मेरे अन्दर मुकाबला करने की ताकत फ़िर से जगने लगी,मै जोर जोर से इस मंत्र को बोलने लगा,अचानक थोडी दूर से आवाज आयी,"डरना नहीं,मैं आ रहा हूँ",और सामने देखा तो मेरे गांव के ब्राह्मण अपना बेंत लेकर सामने खडे थी,भेडियों का पता नही था,सब उन्हे देख कर भाग गये थे,वे मुझे लेकर मेरे घर आये,और मेरी माताजी को मुझे सम्भलवा कर चले गये.मैने माताजी को पूरा किस्सा बताया,तो उन्होने इस मंत्र को ग्यारह बार बोल कर मुझे पानी पिलवाया,मेरे अन्दर शांति का संचार हुआ.
कुछ दिन बाद वे ब्राह्मण मेरी माताजी से मिले,मेरी माताजी ने उनको धन्यवाद दिया कि,आपकी बदौलत उनका पुत्र सुरक्षित घर पहुंचा,उन्होने आश्चर्य से कहा कि,वे तो पिछले दो महिने से कलकत्ता अपने पंडिताई के काम से गये थे,उन्होने तो किसी को नही बचाया,सुन कर मेरी माताजी सन्न से रह गयीं,उन्होने घर आकर मुझे बताया कि उस दिन जो पंडित तुम्हे घर छोड कर गये थे,वे वह पंडित नही थे,वे पंडित तो कलकत्ता गये थे,वह तो कोई दूसरा ही था,लेकिन मै उनको अच्छी तरह से जानता था,माताजी ने भी देखा था,पडौस के लोगों ने भी देखा था,फ़िर वह सिवाय रामभक्त हनुमान के अलावा और कोई नही था,आज भी उस रूप के स्मरण करने के बाद आंखों में आंसू आजाते है,कि पता नही कब किस रूप में आकर बिगडता हुआ काम बनाकर चले जायें.

अगर किन्ही सज्जन को इस मंत्र से लाभ मिले हों तो कृपया मुझे ईमेल करें- moc.oohay|airuadahbortsa#moc.oohay|airuadahbortsa

विभिन्न कष्ट निवारण मंत्र

ईश्वर दर्शन के लिये

नील सरोरुह नील मनि नील नीलधर श्याम । लाजहि तन शोभा निरखि कोटि कोटि शत काम ॥

आराम मिलने के लिये

रामचरन द्रढ प्रीति कर बालि कीन्ह तन त्याग । सुमन माल जिमि कंठ से गिरत न जानै नाग ॥

रक्षा मंत्र

मामभिरक्षय रघुकुल नायक । घृतवर चाप रुचिरकर सायक ॥

विपत्तिनाश के लिये

राजिवनयन धरें धनु सायक । भगत विपति भंजन सुखदायक ॥

संकटनाश के लिये

जो प्रभु दीनदयाल कहावा । आरति हरन वेद जसु गावा॥
जपहि नामु जनु आरति भारी। मिटहि कुसंकट होहिं सुखारी॥
दीन दयाल विरिदु सम्भारी। हरहु नाथ मम संकट भारी॥

कठिन कलेश नाश के लिये

हरन कठिन कलि कलुष कलेसू। महामोह निसि दलन दिनेसू॥

विघ्न शांति के लिये

सकल विघ्न व्यापहिं नहि तेही।राम सुकृपा बिलोकहिं जेही॥

दुख नाश के लिये

जब ते राम ब्यहि घर आये।नित नव मंगल मोद बधाये॥

चिन्ता की समाप्ति के लिये

जय रघुवंश बनज बन भानू। गहन दनुज कुल दहन कृशानू॥
दैहिक दैविक भौतिक तापा।राम राज काहूहिं नहि ब्यापा॥

शत्रुनाश के लिये

बयरु न कर काहू सन कोही।राम प्रताप विषमता खोई॥

शत्रु के सामने जाने के लिये

कर सारंग तूण कटि माथा।अरिदल दलन चले रघुनाथा॥

विवाह के लिये

तब जनक पाइ वशिष्ठ आयुस ब्याह साजि संवारि कें।
मांडवी श्रुतकीरति उरमिला,कुँअरि लई हंकारि कें॥

शिक्षा की सफ़लता के लिये

जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी।कबि उर अजिर बचावहिं बानी॥
मोरि सुधारहिं सो सब भांती।जासु कृपा नहि कृपा अघाती॥

विद्या प्राप्ति के लिये

गुरु गृह पढन गये रघुराई।अलप काल विद्या सब आई॥

आकर्षण के लिये

जेहि कर जेहि पर सत्य सनेहू।सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू॥

यात्रा सफ़ल होने के लिये

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा।ह्रदय राखि कौसलपुर राजा॥

प्रेम बढाने के लिये

सब नर करहिं परस्पत प्रीती।चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥

वार्तालाप में सफ़लता के लिये

तेहि अवसर सुनि सिवधनुभंगा।आये भृगुकुल कमल पतंगा॥

सभी तरह की आपत्ति के विनाश के लिये

बंदउं पवन कुमार,खल बन पावक ग्यान घन।
जासु ह्रदय आगार,बसहिं राम सरचाप धर॥

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