कैसे माना जाता है मंगली दोष
भारत ही नही विश्व मे भी मंगली दोष के परिहार के उपाय पूंछे जाने लगे हैं। जो लोग भली भांति मंगली दोष से पीडित है और उन्होने अगर मंगली व्यक्ति को ही अपना सहचर नही बनाया है तो उनकी जिन्दगियां नर्क के समान बन गयीं है,यह प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है। जन्म कुन्डली के अनुसार अगर मंगल लगन में है,मंगल दूसरे भाव में है,मंगल अगर चौथे भाव में है,मंगल अगर अष्टम भाव में है,मंगल अगर बारहवें भाव में है तो मंगली दोष लग जाता है। मंगली दोष हमेशा प्रभावी नही रहता है,मंगल अगर किसी खराब ग्रह जैसे राहु केतु या शनि से पीडित हो रहा हो तो मंगली दोष अधिक परेशान करता है,अगर वही मंगल अगर किसी प्रकार से गुरु या चन्द्र से प्रभावित हो जाता है तो मंगल साफ़ और शुद्ध होकर पूजा पाठ और सामाजिक मान्यता में अपना नाम और धन कमाने में सफ़ल रहता है,इसलिये मंगल को समझने के लिये मंगल का रूप समझना बहुत जरूरी है। मंगल पति की कुन्डली में उसके खून का कारक होता है,उसकी शक्ति जो पौरुषता के रूप में जानी जाती है के रूप में होता है,मंगल भाइयों के रूप में भी जाना जाता है,और मंगल अगर कैरियर का बखान करता है तो वह शनि के साथ मिलकर डाक्टरी,इन्जीनियरिंग,रक्षा सेवा और जमीनी मिट्टी को पकाने के काम,जमीनी धातुओं को गलाने और उनसे व्यवसाय करने वाले काम,भवन निर्माता और रत्नों आदि की कटाई के लिये लगाये जाने वाले उद्योगों के रूप में भी जाना जाता है।
लगन का मंगल
जन्म समय के अनुसार लगन में मंगल के विद्यमान होने पर जातक का दिमाग गर्म रहने वाली बात पायी जाती है,लगन शरीर में मस्तिष्क का कारक है,मस्तिष्क के अन्दर गर्मी रहने जातक को जो भी करना होता है वह तामसी रूप से करता है,शादी के बाद शरीर का शुक्र (रज और वीर्य) जो बाल्यकाल से जमा रहता है वह खत्म होने लगता है शरीर की ताकत रज या वीर्य के द्वारा ही सम्भव है,और शुक्र ही मंगल को (खून की गर्मी) को साधे रहने में सहायक माना जाता है,लेकिन रज या वीर्य के कम होने से शरीर के अन्दर का खून मस्तिष्क में जल्दी जल्दी चढने उतरने लगता है,जातक को जरा सी बात पर चिढचिढापन आने लगता है,इन कारणों से पत्नी से मारपीट या पति की बातों को कुछ भी महत्व नही देने के कारण परिवाव में विघटन शुरु हो जाता है,यह मंगल सीधे तरीके से अपनी द्रिष्टियों से चौथे भाव यानी सुखों में (लगन से चौथा भाव) सहचर के कार्यों में सप्तम से दसवां भाव),सहचर के शरीर को (लगन से सप्तम),सहचर के धन और कुटुम्ब ( सहचर के दूसरे भाव) को अपने कन्ट्रोल में रखना चाहता है,ज्योतिष में मंगल की भूमिका एक सेनापति के रूप में दी गयी है,और जातक उपरोक्त कारकों को अपने बस में रखने की कोशिश करता है,जातक सहचर के कुटुम्ब और सहचर के भौतिक धन को अपना अपमान समझता है (लगन से अष्टम सहचर का कुटुम्ब और भौतिक धन तथा जातक का अपमान मृत्यु जान जोखिम और गुप्त रूप से प्रयोग करने वाला स्थान).इन कारणों के अलावा जिन जातकों के मंगल पर राहु के द्वारा असर दिया जाता है तो जातक के खून के अन्दर और प्रेसर बढ जाता है,और उसके अन्दर इस मंगल के कारण दिमाग को और अधिक सुन्न करने के लिये जातक तामसी कारकों को लेना शुरु कर देता है,दवाइयों की मात्रा बढ जाती है,राहु के असर से जातक के खून के अन्दर कैमिकल मिल जाते है जिनके द्वारा उसे कुछ करना होता है और वह कुछ करने लगता है.मंगल के अन्दर शनि की द्रिष्टि होने से जातक का खून जमने लगता है,और खून के सिर में जमने के कारण जातक को ब्रेन हेमरेज या दिमागी नसों का फ़टना आम बात मानी जाती है,जातक किसी भी पारिवारिक व्यवस्था को केवल कसाई वृत्ति से देखने लगता है,अक्सर इन कारणों के कारण ही जातक की बुद्धि समय पर काम नही कर पाती है और आजकल के भौतिक युग में एक्सीडेंट और सिर की चोटों का रूप मिलता है,जातक के सिर के अन्दर शनि की ठंडक और मंगल की गर्मी के धीरे धीरे ठंडे होने के कारण जातक शादी के बाद से ही कार्यों से दूर होता जाता है,मंगल पर अगर केतु का असर होता है तो जातक का खून निगेटिव विचारों की तरफ़ भागता है उसे लाख समझाया जाये कि यह काम हो जायेगा,तो वह अजीब अजीब से उदाहरण देना शुरु कर देता है अमुक का काम नही हुआ था,अमुक के काम में फ़ला बाधा आ गयी थी,उसे अधिक से अधिक सहारे की जरूरत पडती है,शादी सम्बन्ध का जो फ़ल जातक के सहचर को मिलना चाहिये उनसे वह दूर होता रहता है,और कारणों के अन्दर सहचर के अन्दर जातक के प्रति बिलकुल नकारात्मक प्रभाव शुरु हो जाते है,या तो जातक का सहचर किसी व्यभिचार के अन्दर अपना मन लगा लेता है अथवा वह अपने को अपमान की जिन्दगी नही जीने के कारण आत्महत्या की तरफ़ अग्रसर होता चला जाता है,इसी प्रकार से मंगल पर अगर सूर्य की द्रिष्टि होती है तो जातक के अन्दर दोहरी अहम की मात्रा बढ जाती है और जातक किसी को कुछ नही समझता है इसके चलते सहचर के अन्दर धीरे धीरे नकारात्मक स्थिति पैदा हो जाती है जातक या तो जीवन भर उस अहम को हजम करता रहता है अथवा किसी भी तरह से जातक से कोर्ट केश या समाज के द्वारा तलाक ले लेता है,इसी प्रकार से अन्य कारण भी माने जाते है।
चतुर्थ मंगल
कुन्डली से चौथा भाव सुखों का भाव है,इसी भाव से मानसिक विचारों को देखा जाता है,माता के लिये और रहने वाले मकान के लिये भी इसी भाव से जाना जाता है,यही भाव वाहनों के लिये और यही भाव पानी तथा पानी वाले साधनों के लिये माना जाता है,घर के अन्दर नींद निकालने का भाव भी चौथा है.सहचर के भाव से यह भाव कर्म का भाव होता है,जब जातक एक चौथे भाव में मंगल होता है तो जातक का स्वभाव चिढचिढा होता है वह जानपहिचान वाले लोगों से ही लडता रहता है,जातक के निवास स्थान में इसी मंगल के कारण लोग कुत्ते बिल्ली की तरह झगडा करने वाले होते है,हर व्यक्ति उस जातक के घर का अपने अपने तर्क को ताकत से देना चाहता है,अक्सर वाहन चलाते वक्त साथ में चलने वाले वाहनों के प्रति आगे जाने की होड भी इसी मंगल वाले लोग करते है,और जरा सी चूक होने के साथ ही या तो सीधे अस्पताल जाते है या फ़िर वाहन को क्षतिग्रस्त करते हैं। सहचर के कार्य भी तमतमाहट से भरे होते है,जातक की माता सहचर के कार्यों से हमेशा रुष्ट रहती है,जातक के शरीर में पानी की कमी होती है,वह अपने सहचर को कन्ट्रोल में रखना चाहता है,अपने पिता के कार्यों में दखल देने वाला और बडे भाई तथा दोस्तों के साथ सीधे रूप में प्रतिद्वंदी के रूप में सामने आता है,सहचर के परिवार वालों से भी वह उसी प्रकार से व्यवहार करता है जैसे कोई सेनापति अपने जवानों को हमेशा सेल्यूट मारने के लिये विवश करता है,जातक को घर वालों से अधिक बाहर वालों से अधिक मोह होता है और जातक का स्वभाव सहचर के लिये,शरीर,मन,और शिक्षा के प्रति भी रुष्ट रहता है। मंगल के चौथे भाव में होने का एक मतलब और होता है कि जातक का दिल शरबत की तरह मीठा होता है,और वह जातक को जरा जरा सी बातों के अन्दर चिपकन पैदा कर देता है,उसे हर कोई पी जाना चाहता है।








