ग्रह स्थिति (जन्म समय में शक्तियों का स्थापित होना)
Compatibility
कुण्डली श्री धर्मेन्द्र सुरतानी
- तुला लगन है,लगनेश शुक्र बुध के साथ दसवें भाव में विराजमान है
- धनु राशि है लगनेश गुरु राहु के साथ छठे भाव में विराजमान है,
- सूर्य राशि मिथुन है और लगनेश बुध शुक्र के साथ दूसरे भाव में विराजमान है.
- नवान्श कुम्भ का है,और लगनेश शनि मंगल के साथ चौथे भाव में विराजमान है.
लगन से ग्रहों की आपस की द्रिष्टि (शक्तियों का शक्तियों को देखना,और जो होना है,वह अवश्य होना)
- लगन से गुरु राहु मृत्यु भाव से कार्यभाव पिता के भाव में विराजमान शुक्र और बुध को देख रहे है,
- लगन से गुरु राहु मृत्यु भाव से खर्च और यात्रा भाव में विराजमान मंगल को देख रहे है,
- लगन से गुरु राहु मृत्यु भाव से धन भाव में विराजमान केतु को देख रहे है.
- लगन से संतान और शिक्षा तथा जुआ लाटरी भाव में विराजमान वक्री शनि धन भाव में विराजमान केतु को देख रहे है.
- लगन से केतु धन भाव से कार्य तथा पिता के भाव में विराजमान शुक्र और बुध को देख रहे है.
- लगन से मंगल खर्च और यात्रा भाव से संचार और शक्ति भाव में विराजमान चन्द्रमा को देख रहे है.
- लगन से सूर्य धर्म और भाग्य भाव मै बैठ कर संचार और पराक्रम भाव में चन्द्रमा को देख रहे है.
- लगन से चन्द्रमा पराक्रम और संचार भाव से धर्म और भाग्य भाव में विराजमान सूर्य को देख रहे है.
लगन से ग्रहों के द्वारा भावों को देखना (इच्छा होना लेकिन प्राप्त नही होना,संतुष्ट नही होना)
- मृत्यु भाव से गुरु राहु का सुख और माता मकान को देखना,इस भाव के शनि पंचम में हैं
- कर्म भाव से शुक्र बुध का सुख और माता मकान को देखना लेकिन इस भाव के शनि का पंचम मे होना.
- पुत्र संतान और जुआ लाटरी शिक्षा के भाव मे शनि का होना और तीसरी नजर से पत्नी,और सलाह देने वाले लोगों को देखना,मगर इस भाव के मालिक मंगल का खर्च यात्रा और मोक्ष में जाकर बैठ जाना.
- खर्च यात्रा और शांति के भाव में विराजमान मंगल का कर्जा दुश्मनी बीमारी के भाव का देखना,लेकिन इस भाव के मालिक का मृत्यु भाव में राहु के साथ विराजमान हो जाना.
- खर्च यात्रा और शांति के भाव में मंगल का होना और मंगल पत्नी और सलाह देने वाले घर को देखना मगर वहां पर किसी का नही होना,लेकिन वहां के मालिक की जिम्मेदारी खुद के पास होना और बाहर जाकर बैठ जाना.
ग्रहों का विवेचन (लगनानुसार)
ग्रह शक्ति के रूप में विद्यमान होते है,और लगन के ग्रह पूरी जिन्दगी अपनी शक्ति से जो कुछ उनको देना होता देते रहते है,वह चाहे अच्छा हो या बुरा,देना उनको जरूरी होता है.उसी के अनुसार कुन्डली की व्याख्या करने पर जो भी सामने आता है,उसका विव्रण इस प्रकार से है,इस कुन्डली की लगन तुला है,तुला राशि व्यापारिक मामलो और बैलेंस से सम्बन्धित कामो से अपना जुडाव रखती है,इस राशि का स्वामी शुक्र है,जो दसवें भाव में बुध के साथ विराजमान है,दसवां बुध पिता की बहिन से अपना रिस्ता बताता है,और लगनेश जब पिता की बहिन के साथ है,तो इसका मतलब है,कि पिता के स्थान पर बुआ का स्थान है,सूर्य इस शुक्र से पीछे यानी नवें भाव में विराजमान है,सूर्य को पिता का दर्जा दिया गया है,और सूर्य कानून के घर में यानी लगन से नवें भाव में है,नवां भाव धर्म का माना जाता है,धर्म से दूसरा कर्म होता है,कर्म के भाव में लगनेश का विराजमान होना और नवमेश बुध का साथ होना,साथ ही बारहवें भाव के स्वामी के रूप में भी बुध का साथ होना,यह दोनो ही बातें जातक के लिये महत्वपूर्ण है,शुक्र बुध दोनो ही सूर्य और मंगल के बीच में विराजमान होकर अपने को पापकर्तरी योग में बता रहे है,पीछे सूर्य है और आगे मंगल सूर्य पिता का कारक है,और मंगल भाई का कारक है,लगन के अनुसार मंगल सप्तम का स्वामी भी है,और जीवन साथी के रूप में भी अपना स्वभाव बताता है.शुक्र का मंगल और सूर्य के बीच में होने का मतलब है,कि जातक जो शुक्र रूप में है,न तो पिता के पास रहने वाला है,और न ही भाइयों के पास रहने वाला है,बुध जो सूर्य का मित्र है,और मंगल का दुश्मन इसलिये मंगल के साथ बुध के साथ रहने तक शुक्र का कुछ बिगडता नही है,बुध भी सम्भाल नही पाता है,क्योंकि मंगल बारहवां है,और बारहवां मंगल राहु कहीं भी हो उसे सम्भाले रहता है,राहु हाथी है,तो मंगल उसका अंकुश,जातक को बुआ के द्वारा कानूनी रूप से और सामाजिक रूप से अपना पुत्र बनाया गया है,बुध जो बुआ की कारक दसवें घर में जाकर बन गयी है,उसने जातक को यानी शुक्र को अपने आगोस में ले रखा है,दोनो मिलकर चौथे भाव को देखते है,चौथा भाव ही जन्म स्थान है,और चौथा भाव ही मौत का स्थान है,इसे मोक्ष का स्थान भी देखते है,दसवां घर दक्षिण दिशा का कारक है,इसलिये जातक को बुआ के द्वारा अपने जन्म स्थान से दक्षिण दिशा की तरफ़ ले जाया गया,मगर गुरु जो पिता का भी कारक है,और दिमाग का कारक भी है,राहु के साथ विराजमान है,इसलिये पिता का आस्तित्व नही मिलता है,जातक से पूंछने पर पता लगा कि पिता का देहान्त हो चुका है,और जातक घर से भागकर जयपुर से दक्षिण दिशा की तरफ़ मुम्बई गया,वहां पर उसकी बुआ के पास रहा है,शक्र को गुरु और राहु आठवें भाव से देख रहे है,आठवें भाव में गुरु अगर विद्यमान है,तो वह जातक को या तो मार देता है,या फ़िर अपने खुद के परिवार से दूर लेजाकर पटक देता है,जातक को इसी गुरु ने राहु की सहायता से इस शुक्र को अमेरिका में बिलिज नामक स्थान पर लेजाकर रख दिया.जातक वही पर है,सप्तमेश का स्थान बारहवें स्थान पर होने के कारण जातक की शादी वहीं अमेरिका में गुरु राहु से युति रखने वाली गुरु यानी समझदार और राहु यानी किसी प्रकार से किसी भी धर्म को मानने वाली स्पेनिस लडकी से शादी कर ली,गुरु यानी जीव जव भी राहु के साथ विद्यमान है,या किसी प्रकार से राहु से युति की है,तो जातक की शादी अन्तर्जातीय ही होती है.अगर किसी प्रकार से गुरु का योग राहु के साथ नही हुआ होता तो इस जातक की उम्र अधिक नही मानी जा सकती थी,गुरु का बल और मंगल का बारहवें भाव से योग इस जातक के लिये लाभकारी हो गया,जब तक यह व्यक्ति धर्म यानी मंगल का मार्ग पकडे रहेगा इसे कोई धन या शरीर का नुकसान नही झेलना पडेगा,दसवें भाव में बुध और शुक्र का आपसी सम्बन्ध होने के कारण या तो यह व्यापार में या कार्य में महिलाओं को जोड कर काम करे,या फ़िर बहिनो के साथ मिलकर धन भाव का केतु का सहारा लेकर सहायकों का सहारा लेकर काम करे,गुरु और राहु ने मंगल के साथ युति करने के बाद जातक के अन्दर मंगल से भोजन,गुरु और राहु से भोजन बनाने की कला का उदय होता है,इसके धन का दुरुपयोग केवल इसके पुत्र और भतीजे के द्वारा लिखा है,जब भी यह बरबाद होगा तो शुक्र और बुध के द्वारा किये जाने वाले व्यवहार के द्वारा और केतु की चालाकी से होगा,सभी भाई यानी मंगल आपस में जुड कर तभी रह सकते है,जब यह व्यक्ति अपने भाइयों के प्रति खर्च करता रहे.एक बात और सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है,कि गुरु यानी जीव का जुडाव राहु यानी मुसलमान जाति से अधिक है,शुक्र यानी पत्नी और बहिन यानी बुध भी इसी गुरु राहु के द्वारा ग्रसित है,इस जातक पर किसी भी प्रकार का तंत्र बहुत ही आसानी से कार्य करता है,और जो लोग इसे अपने कारणों में प्रयोग करना चाहते है,वे इसके ऊपर किसी न किसी प्रकार का तंत्र करने से नही चूकते है,इसे इस तंत्रात्मक प्रभाव से दूर करने के लिये लालकिताब में प्रचलित उपाय दस अन्धे लोगों को भोजन करवाना चाहिये.
सुदर्शन चक्र में ग्रहों का विचार
सुदर्शन चक्र के द्वारा कुन्डली में जो ग्रह अपना प्रभाव गुप चुप रूप से दे रहे होते है,वे पूरी तरह से समझ में आजाते है,इसमे तीनो लगनो,लगन,चन्द्र लगन और सूर्य लगन का मिला हुआ रूप सामने होता है,गोचर से जो भी ग्रह ग्रह से युति करता हुआ निकलता है,उसका पूरा पूरा प्रभाव समझ में आजाता है,इसके साथ ही आगे क्या होने वाला है,वह भी सामने होता है,पीछे की जो भी घटनायें होती है,वे भी समझ में आजाती है,इस सुदर्शन चक्र के द्वारा जिन कुलों के बारे में ज्ञान मिलता है,उनमें सूर्य के द्वारा पिता का कुल,चन्द्र के द्वारा माता का कुल,और लगन के द्वारा अपने द्वारा पैदा किया गया कुल ही मिलता है,इसी प्रकार से सूर्य से जो सामने दिखाई देता है,चन्द्र के द्वारा जो भी सोचा जा रहा है,और जो ह्रदय के अन्दर विराजमान है,और लगन के द्वारा जो भी शरीर से सम्बन्ध रखने के बाद सामने है,समझा जाता है.प्रस्तुत कुन्डली जयपुर पैदा हुये एक सज्जन की है,जो आजकल अमेरिका में अपने बच्चों के साथ रह रहे है,और उनका पूरा परिवार ही शुरु से लेकर वर्तमान तक परेशानियों के घेरे में है,उनकी एक बहिन केवल अपने इसी भाई और अपनी माताजी के लिये ही मानो पैदा हुई थी,और आज भी वे अविवाहित है,उनकी सिफ़्त धार्मिक होने के कारण और उनका विश्वास हिन्दू धर्म के साथ अन्य धर्मों में होने के कारण तथा मानव विशेष में आस्था रखने के कारण मैने उनके परिवार के प्रति केवल एक ही भाई का कुन्डली विश्लेषण करना चालू किया है,समय समय पर उनके द्वारा सूचना देने और जो भी घटना घटी है,उसका विवरण देने के कारण विवेचन में मदद मिली है,जिस व्यक्ति की यह कुन्डली है,उनका नाम श्री धर्मेन्द्र सुरतानी है.आइये आपके सामने सुदर्शन चक्र के द्वारा कुन्डली का विश्लेषण करते है.
लगन और लगन में राशियां
मैने पहले भी लिखा है कि लगन के तीन प्रकार होते है,जन्म के समय में जो आसमानी स्थिति होती है,वह जन्म लगन कहलाती है,जन्म के समय में जो चन्द्रमा की स्थिति होती है,उसके अनुसार चन्द्र लगन या राशि कहलाती है,जिसके द्वारा नाम रखा जाता है,यह केवल भारत में ही प्रचिलित है,कारण चन्द्र ही मन का राजा है,और मन के द्वारा ही सोचने पर अच्छे या बुरे काम होते है,"चन्द्रो मनस्य जायते" ,के द्वारा मन को राजा मान लेने पर चन्द्रमा की महत्ता बहुत अधिक मानी जाती है,और जन्म समय के चन्द्रमा के ऊपर जब कोई ग्रह गोचर से गुजरता है,तो वह अपना प्रभाव मन के ऊपर डालता है,यह सत्य ही माना जा सकता है,जिस प्रकार से जन्म के चन्द्रमा पर जब शनि गोचर करता है,तो साढे शाती का समय कहा जाता है,राहु गुजरता है,तो मानसिक चिन्ताओं में वृद्धि होती है,और जब केतु गुजरता है,तो दिमाग में सब कुछ छोड छाड कर बैराग्य पैदा होजाता है,इसी प्रकार से सूर्य के गुजरने पर दिमाग में अहम और राजनीति करने की भावना का उदय होना चालू होता है,और गोचर के चन्द्र का ही जन्म के चन्द्र के ऊपर गुजरने पर या तो यात्रा हो जाती है,या फ़िर बढिया सा भोजन और जिस भाव का चन्द्र होता है उसी भाव के बारे में भावनाये दिमाग में घूमती रहती है,मंगल के गुजरने पर दिमाग में उग्रता आती है,बुध के गुजरने पर किसी भी विषय पर बोलने या कमन्यूकेशन करने की बात दिमाग में आती है,भूमि तत्व के प्रति लालसा जगती है,गुरु के गुजरने के समय ज्ञान और धन आदि प्राप्त करने के लिये दिमागी प्रयास चालू हो जाते है अधिकतर मामलों में जातक का मन चलायमान होता है,और जातक स्थान परिवर्तन भी कर लेता है,शुक्र के गुजरने पर भौतिक सम्पदा का और भौतिक काम में आने वाली चीजों के प्रति ख्याल जागने लगते है,पुरुष जातक है तो महिलाओं के प्रति और स्त्री जातक है,तो आभूषणों के प्रति या गाडी वाहनों के प्रति मकान बनाने के प्रति भावनायें उदय हो जाती है.यह सिर्फ़ ह्रदय से सोचने के ही क्षेत्र में अपना काम करता है,लेकिन यही बात जब सूर्य लगन में आती है,तो उपरोक्त कारण साक्षात रूप से दिखाई देने लगते है,लगन के ऊपर से गुजरता है,तो शरीर पर इन ग्रहों का असर आने लगता है,और कष्ट वाला ग्रह निकलता है,तो कष्ट और लाभ देने वाल अग्रह निकलता है तो लाभ देता चला जाता है,इसके अलावा चन्द्रमा और सूर्य तथा जन्म लगन जब अन्य भावों में स्थिति ग्रहों पर गुजरते है,तो भी वे अपना अपना फ़ल प्रदान करते हैं,चन्द्रमा की गति सत्ताइस दिन में बारह भावो और तीन सौ साठ डिग्री में अपना असर देती है,जिसके अनुसार एक महिने के अन्दर जातक को सवा दो दिन शरीर के मामले में सवा दो दिन धन और भौतिक साधनों के मामले में,सवा दो दिन अपने द्वारा किये गये संचार के और अपने से छोटे भाई बहिनो के मामले में,सवा दो दिन माता मन और मकान तथा रहने वाले स्थान और जान पहिचान तथा यात्रा आदि के मामले में,सवा दो दिन जल्दी से धन कमाने और खेलने कूदने और मनोरंजन करने के मामले में,सवा दो दिन कर्जा दुश्मनी और बीमारी से जूझने में सवा दो दिन पति पत्नी या साझेदार के प्रति सोचने सवा दो दिन अपमान मृत्यु जानजोखिम के कामो में,सवा दो दिन धर्म और भाग्य के बारे में सोचने के लिये,सवा दो दिन काम धन्धा करने के लिये सवा दो दिन अचल सम्पत्ति और आय के लिये सोचने और सवा दो दिन खर्चा करने बाहर घूमने के प्रति जाने जाते है.इसके अलावा भी कितने ही कारण बनते चले जाते है,जैसे जो लगन जातक की है,वही लगन पिता का चौथा भाव है,वही लगन माता का दसवां भाव है,पत्नी या पति का सातवां भाव है,ताऊ का छठा भाव है,चाचा का दूसरा भाव है,संतान का नवां भाव है,छोटे भाई बहिनो का ग्यारहवां भाव है,बडे भाई बहिनो का तीसरा भाव है,दोस्तों का तीसरा भाव है,कार्य और व्यवसाय का चौथा भाव है,धर्म स्थान का पांचवां भाव है,पुलिस या जेल वालों के लिये दूसरा भाव है,दुश्मनो के लिये आठवां भाव है,और जितना ही इस प्रकार के कारणो के लिये सोचते जाओ आगे से आगे बातें और कारण निकलते चले जाते है.
इस कुन्डली में जातक के जन्म समय की लगन तुला है,चन्द्र लगन धनु है और सूर्य लगन मिथुन है,इन तीनो का मिश्रित फ़ल इस प्रकार से ज्ञात करेंगे.
आगे इस जातक के चन्द्र लगन और सूर्य लगन के साथ नवांश का भेद भी लिखूंगा……..देखते रहिये !
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